कर्मेन्द्रिया व ज्ञानेन्द्रिया क्या होती है ?

कर्मेन्द्रिया व ज्ञानेन्द्रिया क्या होती है ?

दोस्तों यह सवाल हमारे जीवन में कई बार आते है पर हमें इसका ज्ञान नही होता है

तो हम आपको यह सब बतायंगे 

कर्मेंद्रिय तो सर्वथा जड़ है और ज्ञानेंद्रियों में चेतनता का  आभास है

उस आभास को लेकर ही श्रोता,त्वचा ,चक्षु,रचना और घ्राण इन को लेकर जीवात्मा विषयों का    सेवन करती है I

इंद्रियों अंतकरण इनमें आत्मा की चेतना का प्रकाश है दिव्य सताओं ने हर मनुष्य के भीतर उसके   स्थूल सूक्ष्म  व कारण शरीर में अनमय कोश ,प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोष, आनंदमय कोष जैसे आवरणों में अपना अंश रखा है वही ईश्वर अंश है I

ब्रह्म के 6 रूप है :- आनंद, सत्ता, चेतन, नाम, रूप, कर्म.

इनमें तीन दृष्ट आएं :-  आनंद, सत्ता, चेतन.

तीन द्रष्टा है जो काल्पनिक है :-नाम, रूप, कर्म.

जब मनोमय को (मन ) जब विज्ञानमय कोष में होता हुआ आनंदमय कोष में पहुंचता है तब आनंद सत्ता और चेतना दृष्टा के रुप में बाहर ब्रम्ह में देखती हैं जो दृष्टा नाम, रूप , कर्म को साथ लेकर मन बाहर कहीं भी यात्रा करके वापस लौट आता हैं I

यही  प्रक्रिया अपनाकर  मन इंद्रियों को साथ लेकर दृष्टा आनंद सता , चेतना ब्रह्म में कहीं पर घूमकर आ जाती है शरीर यहीं रहते हुए भी आनंद में अ का अर्थ चारों ओर हैं तथा नंद का अर्थ फैलाव है द्रष्टा सत्य स्वर है तथा द्रश्य काल्पनिक हैं यही प्रक्रिया स्वपन में भी चलती रहती है मन कहीं भी घूम कर वापस आ जाता है यह विस्तार केवल आत्मा के अलावा नहीं है जो शरीर में रहते हुए भी बाहर ब्रहम में अपना विस्तार कर सकती है संपूर्ण जगत का मूल ब्रह्म  है द्रष्टा और दृश्य जो दिग देशकाल से प्रभावित ना हो जो ठहरा हुआ चलता है शरीरके सभी अंग और धातुएं आत्मा से निकलते और बनते हैं आत्मा में से कुछ भी विकार नहीं आता तो अत: आत्मा को आनंद कहते हैं आनंद शक्ति का प्रतीक है आनंद अपने एक केंद्र पर ठहर कर शरीर से बाहर अनंत आकाश मंडल में दूर-दूर तक परमानंद से जुड़कर पदार्थों को प्रकाशित करता हुआ फैला है यही फैलाव इस आनंद की चेतना है शरीर के संपूर्ण शोणित मंडल में यह फैला हुआ है आनंद सत्ता, चेतन, सूर्य और प्रकाश की तरह अविना भूत हैं दृष्टा  और द्रश्य  जिनको जीवात्मा कहते हैं अपने अंदर जो ईश्वर तत्व हैं वह अपने पूर्वजों के द्वारा बीज

के माध्यम से अपने में है पहले माता-पिता से उर्जा पूर्ति बाद में प्रकृति से उर्जा पूर्ति यही है जीव ब्रह्म एक है अस्तित्व के सत्य का ज्ञान है I

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