क्या होता है ध्यान क्या होते है परलोक और पुनर्जन्म

क्या होता है ध्यान क्या होते है परलोक और पुनर्जन्म

दोस्तों यह सवाल हमारे जीवन में कई बार आते है पर हमें इसका ज्ञान नही होता है

तो हम आपको यह सब बतायंगे

ध्यान

ध्यान

-:ध्यान:- करने की बेस्ट विधि

आध्यात्मिक जीवन का सबसे बड़ा सहारा ध्यान है ध्यान के जरिए हम अपनी भौतिक भावनाओं से अपने आप को अलग कर लेते हैं अपने देवी स्वरूप का अनुभव करने लगते हैं I ध्यान करते समय हमें कोई बाहर ही साधना पर निर्भर नहीं रहना पड़ता है गहरे स्थान को भी आत्मा की ज्योति दिव्य प्रकाश से भर देती हैं I स्वार्थ  व शत्रु भाव नष्ट कर अपने आप के मूल भाव को भूलकर अलौकिक शक्ति का अपने अंदर अंतःकरण में ध्यान लगाने पर दिव्य प्रकाश की लोह को देखकर सुकून अनुभव करना ही अपने आप में खोजना ही ध्यान का स्वरुप है I

 

                                        -:परलोक और पुनर्जन्म:-

परलोक और पुनर्जन्म का सिद्धांत हिंदू धर्म की खास संपत्ति है हमारा कोई धार्मिक कृत्य ऐसा नहीं है जिसका प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रुप से परलोक से संबंध न हो हमारे सभी ग्रंथों प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रुप से प्रयोग एवं पुनर्जन्म का समर्थन करता है I

भारत में कई स्थानों पर ऐसी घटनाएं भी प्रकाश में आई है जिनमें अबोध बालक बालिकाओं ने अपने पूर्व जन्म की बातें कही हैं जो जांच पड़ताल करने पर सत्य पाई गई I

आत्मा की उन्नति तथा जगत में धार्मिक भाव सुख शांति तथा प्रेम के विस्तार के लिए तथा पाप ताप से बचने के लिए परलोक और पुनर्जन्म को मानना आवश्यक भी है आज संसार में हर देश में आत्महत्याओं की संख्या दिनों दिन बढ़ रही है आए दिन लोगों के जीवन से निराश होकर अथवा सफलता से दुखी होकर कर कर्ज व अपमाना अपकीर्ति से दुखी होकर आत्महत्या को गले लगा देते हैं उसका एकमात्र प्रधान कारण है

आत्मा की अमरता में तथा परलोक में अविश्वास होना है यदि हमें यह निश्चय हो जाए कि हमारा जीवन ही शरीर तक ही सीमित नहीं है इससे पहले भी हमसे और उसके बाद भी हम रहेंगे I

इस शरीर का अंत कर देने से हमारे कष्टों का अंत नहीं हो जाएगा शरीर के भोगो को भोगे बिना ही प्राण त्याग कर देने से तथा आत्महत्या रूप नया घोर पाप करने से हमारा भविष्य जीवन और भी अधिक कष्ट मय होगा तो हम कभी आत्महत्या करने का साहस न करें हमारा देश भी पाश्चात्य  जड़वाली सभ्यता के संपर्क में आने से यह पाप हमारे आधुनिक शिक्षा प्राप्त नवयुवकों में भी घट कर रहा है जबकि हमारे शास्त्रों में आत्महत्या को बहुत बड़ा पाप माना है I

संसार में पापों की वृद्धि हो रही है झूठ कपट चोरी हिंसा व्यभिचार एवं अनाचार बढ़ रहे हैं व्यक्तियों की भांति राष्ट्र में भी द्वेष और कलह

की वृद्धि हो रही है बलवान दुर्बलो को सता रहे हैं लोग नीति और धर्म के मार्ग को छोड़कर अनीति और अधर्म के मार्ग पर चलने लगे हैं I लौकिक उन्नति और भौतिक सुख को लोगों ने अपना धेय्य बना लिया है लोगों की देव वृति कम हो रही है तथा राक्षस वृति बढ़ती जा रही है विलासता और इंद्रियलोलुपता बढ़ती जा रही है जीभ के स्वाद और शरीर के आराम के लिए दूसरों को कष्ट की तनिक भी परवाह नहीं की जाती मादक द्रव्यों का प्रचार बढ़ रहा है बेईमानी और घूसखोरी बढ़ रही है एक दूसरे के प्रति विश्वास कम  होता जा रहा है अपराधों की संख्या बढ़ रही है दम्य और पाखंड की वृद्धि हो रही है I

इन सब का कारण यही है लोगो ने वर्तमान जीवन को ही अपना मान लिया है इसके आगे भी कोई जीवन है इसमें उनका विश्वास नहीं है इसलिए वह वर्तमान जीवन को सुखी बनाने में लगे हुए है I

 

 

“कि खाओ पियो और मौज उड़ाओ”

मरने के बाद क्या होगा किसने देख रखा है I

इसी सर्वनाशकारी मान्यता की और आज प्राय सारा संसार जा रहा है यही कारण है कि वह सुख के बदले  अधिकाधिक दुखों में ही फसता जा रहा है परलोक और पुनर्जन्म न मानने का यह अवश्यभावी फल है

जो मूर्ख धन के मोह से अंधे  होकर प्रमाद में लगे रहते हैं उन्हें परलोक का साधन नहीं सूझता यही लोग हैं परलोक नहीं हैं ऐसा मानने वाला पुरुष बारंबार काल  के चंगुल में फंसा रहता है यह नित्य चिन्मय आत्म न जन्मता है ना मरता है यह न तो किसी वस्तु से उत्पन्न हुआ है और ना ही स्वयं ही कुछ बना है अर्थात ( न तो यह किसी का कार्य है ना कारण है ना विकार है ना विकारी है ) यह अजन्मा नित्य ( सदा से वर्तमान अनादि ) शास्वत (सदा रहने वाला अनंत ) और पुरातन है तथा शरीर के विनाश किए जाने पर भी नष्ट नहीं होता यह चेतन तत्व

 

प्रकाश स्वरुप परमात्मा का सूक्ष्म रूप है जिसमें शरीर के 2 ½   तत्व 1.  वायु तत्व 2.  आकाश तत्व  व आधा तेज तत्व की गुंथी बनकर छोटे ब्रह्म स्वरूप शरीर से निकल कर ब्रहम ब्रहहम स्वरूप विश्व राष्ट्र परमात्मा में विलीन हो गई है जैसे मोबाइल में विद्युत धर्मी विकीरणों टावर से व्यक्तिगत मोबाइल में जाती है I

जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्याग कर दूसरे नई वस्त्रों को ग्रहण करता वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीर को त्याग कर दूसरे नए शरीर को प्राप्त होता है जिससे मोबाइल की छोटी चिप में कहीं गाने रिकॉर्ड हो जाते हैं वैसे ही आत्मा की गुंथी में किए गए कर्मों की सूची भी परब्ध के रुप में साथ रहती है जैसा कर्म वैसा ही फल भोगना पड़ेगा यह निश्चित हैं Iसत्व गुणी लोग देवयानी को रजोगुणी लोग मनुष्य योनि को और तमोगुणी त्रियग्योनी को प्राप्त होते हैं I शरीर की तरह आत्मा का परिवर्तन नहीं होता आत्मा चेतन तत्व है शरीर जड़ और चेतन दोनों का

 

स्वरुप है जो चेतन के तत्व से घटता बढ़ता रहता है मृत्यु होने पर अमृततत्व चेतन स्वरुप जड़ से अलग होना ही मृत्यु है शरीर में चेतना आत्मा की है तथा ब्रहम में चेतना ईश्वर की है यदि आत्मा में बदलाव होता तो हमें पिछली बातें याद नहीं रहती कई लोगों ने तो पिछले जन्म की बातें भी बताइ  इससे सिद्ध होता है कि आत्मा एक इकाई है इसमें बदलाव नहीं होता I

मनुष्य जीवन में अपने आभाव कमी नहीं देखता वह सोचता भी नहीं कि एक दिन मैं नहीं रहूंगा अपनी आत्मा की तरफ से सदा नहीं रहने की गवाही कभी नहीं मिलती जिस से आत्मा की नित्यता सिद्ध होती हैं I जीवो में जो सुख दुख का भेद प्रकृति स्वभाव गुण कर्म का भेद काम क्रोध राग द्वेष आदि का भेद क्रिया का भेद बुद्धि का भेद दृष्टिगोचर होता है उससे भी पुनर्जन्मसिद्ध होता है एक ही माता-पिता से उत्पन्न

हुई संतान यहां तक कि एक साथ पैदा हुए बच्चे भी इन सब बातों में एक दूसरे से विलक्षण पाए जाते हैं पूर्व जन्म के संस्कारों के अतिरिक्त इस विचित्रता में कोई हेतु नहीं हो सकता जिस प्रकार ग्रामोफोन की चूड़ी पर उतरे हुए किसी गाने को सुनकर हम यह अनुमान करते हैं कि इसी प्रकार किसी मनुष्य ने इस गाने को कहीं अन्यंत्र गाया होगा तभी उसकी प्रतिध्वनि को आज हम इस रूप में सुन पाते हैं उसी प्रकार आज हम किसी को सुखी – अथवा देखते हैं अथवा अच्छे बुरे स्वभाव और बुद्धि वाला पाते हैं उसेसे यही अनुमान होता है कि उसमें पूर्व जन्म में वैसे ही कर्म किए होंगे जिनके संस्कार उसके अंतकरण में संग्रहित हैं जिन्हें वह अपने साथ लेकर आया है यदि किसी को वर्तमान जीवन में हम सुखी

पाते हैं तो उसका मतलब यही है कि उसने पूर्व जन्म में अच्छे कर्म किए होंगे और जो दुखी होते हैं I इसका यह मतलब होता है कि उसमें पूर्व जन्म में अशुभ कर्म किए होंगे यही बात स्वभाव गुण और बुद्धि आदि के संबंध में समझनी चाहिए ईश्वर सर्वदा निर्दोष हैं I दुख सुख

 

कर्मों के अनुसार हैं I इन सब बातों से सिद्ध होता है कि प्राणियों  का पुनर्जन्म होता है ऐसे स्थिति में मनुष्य को सुख की प्राप्ति तथा दुखो से सदा के लिए छुटकारा जीवात्मा का ध्यये होना चाहिए मनुष्य जीवन में जीवन सुधार का अधिकार मिला है अत:चौरासी लाख योनियों से छुटकारा पाने हेतु ईश्वर चरणागति विधि के विधान का पालन एवं मोह माया का त्याग कर वृतियों की निर्वात कर नए कर्मों का बंधन से मुक्ति सत्य कर्मों में निस्वार्थ भाव से सेवा में लगे रहना सभी के प्रति निर्मल भाव ईश्वर द्वारा प्रदान की गई मानव  विशेषता का सही सदुपयोग है I

यह मनुष्य शरीर समस्त सुखों की प्राप्ति का आदि कारण तथा अत्यंत दुर्लभ होने पर भी ईश्वर की कृपा से हमारे लिए सुलभ हो गया है वह इस संसार रूपी समुंदर पार होने की समृद्ध नौका है इसके नाविक गुरु और परमात्मा के स्वरुप है I

हमने संसार में उनक जन्म लेकर सहस्त्रों माता पिता और सैकड़ों स्त्री पुरुषों के सुख का अनुभव किया है परंतु अब ये किसके हैं अथवा हम उन में से किसके हैं I

वर्तमान समय में मानव दो तरह के है  1.  देव वृति के लोग

  1. राक्षक वृति के लोग
  • देववृति के लोगों में करुणा दया प्रेम भाईचारा सद्विचार और जीओं और दूसरों को भी जीने दो के विचार भले होते है I
  • राक्षशवृति के लोगों में तृष्णा इर्ष्या क्रोध भेदभाव घृणा अनैतिक कार्य बुरे विचार तथा उनकी घटिया सोच होती हैं ऐसी सोच में परिवर्तन लाने के लिए उपाय भी समय की मांग है I

“कहावत है की भय वगैर प्रीत नही है”अतः व्यक्ति के द्वारा किए गए कर्मों का ज्ञान व उसके कर्मों का फल के बारे में ज्ञान व ध्यानआकर्षित करने हेतु परलोक और पुनर्जन्म की जानकारी भी होनी चाहिए I

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