क्या होता है-:शब्दब्रह्म:-

-:शब्दब्रह्म:-

दोस्तों यह सवाल हमारे जीवन में कई बार आते है पर हमें इसका ज्ञान नही होता है

तो हम आपको यह सब बतायंगे

परमात्मा – प्रत्यक्ष – अपरोक्ष ही है ये ही वस्तुओं सता – स्पूर्ति जीवन -दान करते हैं वे ही पहले अनाहद – नाद स्वरुप परावग्णी नामक प्राण के साथ मूलाधार चक्र में प्रवेश करते हैं उसके बाद मणिपुरक चक्र( नाचिका ) में पश्यन्ति वाणी का मनोमय सूक्ष्म रूप धारण करते हैं फिर कंठ के केवल में स्थिर विशुद्ध चक्र में मध्यमा वाणी के रुप में व्यक्त होते हैं फिर मुख में आकर ह्स्व दिघार्दी की मात्रा

उदात – अनुदात  आदि स्वर तथा ककारादि वर्ण रूप स्थूल बैरबरी वाणी का रूप ग्रहण करते हैं यह शब्द ब्रह्म स्वरूप भाषा है I

 

व्यक्ति दिमाग की क्रिएटिव इमेजिनेशन के कारण  ही जीव जगत में अपनी अलग ही विशेषता रखता है इंसान की कल्पना शीलता इस दुनिया की सबसे ताकतवर शक्ति है यह असंभव को संभव बना सकती है ईश्वर ने जीव जगत में मानव की विशेषताएं दी है I

  1. ईश्वर ने अपना रुप दिया I
  2. स्वतंत्र आप यह सेवा करने के लिए I
  3. विवेक दिया ज्ञान की जागृति के लिए I

 

  1. खुश रहने के लिए  हंसने की कला दी I
  2. विभिन्न भाषाएं बोलने के लिए शब्दब्रह्म दिया I
  3. अपने जन्म सुधार का अधिकार दिया I
  4. जड़त्व चेतन में भेद की समझ दी I

मानव शरीर लघु प्रमाण स्वरूप है I

आत्मा ईश्वर स्वरुप लघु इकाई है I

सत्य आत्माओं के समूह परमात्मा स्वरुप है I

चेतना के विकास से नर से नारायण बन सकता है मानव पराशक्ति + आदि शक्ति का योग परमात्मा है जो आस्तिक और नास्तिक विचारों से परे हैं जीवात्मा = जव+आत्मा = जीव का संबंध प्रकृति से है जो सत्य होते हुए भी परिवर्तनशील हैं जब की आत्मा परमात्मा का अंश है जो सदा सत्य हैं  अपरिवर्तनशील है जब तक जीवात्मा एक रहती है तब तक जीवन एक है जब प्रकृति (जीव) का परिवर्तन होना ही मृत्यु है जब आत्मा सत्य में समा जाती है यहीं जन्म व मृत्यु का कारण है परिवर्तन प्रकति का सार्वभौम गुण है जो सापेक्ष सत्य हैं तथा परमात्मा का निरपेक्ष सत्य है स्थूल शरीर में आत्मा जैसे दूध में घी रहता है वैसे ही रहती है शरीर मिलता है कर्म फल भोगने को जब कर्मों के नए बंधन न बंधे पुराने कर्म मुक्त हो जाए तब आत्मा को नया शरीर नहीं मिलता इसी को मोक्ष कहा हैं I

सृष्टि सतासिद्ध है  प्राणयति सिद्ध है  निराकार निष्कल अनिर्वचनीय है

सोम-शीतल- तत्व के धरातल पर अग्नि कणों के उतार-चढ़ाव से एक ऋतुए  बनती है सर्दी- गर्मी – वर्षा होती है अग्नि का विकास से वसंत-ग्रीष्म वर्षा होती है तथा अग्नि के हवास होने पर शरद- हेमंत- सिसिर होता है अग्नि ही सोम का रूप लेती हैं जैसे जैसे ऊपर उठती है शीतल हो जाती है स्वयंभू लोग के चारों ओर तप लोग हैं परमेष्ठी लोग इसी स्वयंभू की  परिक्रमा करता है परमेष्ठी के अधिष्ठता विष्णु प्राण है I नाभि में ही ब्रह्म प्राण है केंद्र में प्रतिष्ठा तत्व है उससे ही गति तत्व

पैदा होता है गति सदा केंद्र से परिधि की तरफ जाती है वही जब केंद्र की ओर आती है तो अगति कहलाती है स्थिति ब्रह्म है गति इंद्र हैं अगति विष्णु है यही ह्रदय हैं यही अक्षर विद्या है तीनों ही मूल अक्षर प्राण है I

प्राण की शक्ति से ही भूपिंड का निर्माण होता है केंद्र व्यास परिधि को ही क्रमशः यजु ऋत्क साम कहते हैं यही सृष्टि निर्माण के मूल है  व्यास और परिधि से ही आयतन बनता है इसी में प्राण कार्यकर्ता हैं इसी के रस भाग को यजु कहते हैं यही ब्रह्म है ऋत्क – यजु – साम दे रुप नंदन है से ही ऋत का सत्य बनता है I

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